Monday, 4 February 2013

जीती गंगानगरिया उर्फ़ जगजीत सिंह

मुलाक़ात - सुखदर्शन सेखों 

                              (काश आज वो हमारे बीच होते !)

बचपन की गलिआं, उन में मौलती शरारतें, मस्तियाँ करते दोस्त मोहन, मोनी, केवल और सरदूल | इन सारे दोस्तों को साथ लेकर गोल गोल आँखों का नाच नचाता हुआ एक शरारती लड़का बिलकुल मेरे सामने आकर खड़ा हो जाता है- जीती | ये उसका घर का छोटा नाम था और जगह थी, राजस्थान के अंदर गंगानगर |
अब चलते हैं महाराष्ट्र में, वहां भी एक जगह है खंडाला | खंडाला में एक घर और उस घर के अंदर एक बगीचा | गीली मिट्टी में लिपटे हाथों से सवेर की सुनहरी धुप में फूलों की, पानी से प्यास बुझाता एक शख्श- जगजीत सिंह |
अमरीका का एक शहर फ्रेज्नो, जहाँ शाम को आखरी गजल सुनती है एक महफ़िल | शांत सुरमई नशे से भरी हुई लोगों की बहुत सारी भीड़ | इस भीड़ के हाथ उस संगीतक महफ़िल के नाएक  के पाँव पकड लेते हैं, और उनके होठों से आवाज़ निकलती है 'वनस मोर वनस मोर' | अक्सर ऐसे ही होता है | नाएक 'कभी फिर सही' का बहाना लगाना चाहता है, लेकिन भीड़ को कौन मनाये ?  नायक हाथ बांधता है लेकिन कोई भी फ़ायदा नहीं होता .. ..जवानी की दहलीज़ पर कदम रखकर चला जा रहा उनका एक बेटा है, मनपसंद काम है , पैसे हैं, पत्नी है, लेकिन एक दिन एक कार दुर्घटना हो जाती है .. ..सच्चे सपने जैसा उनका पुत्तर रेज़ा रेज़ा हो जाता है, वो जिसके लिए इतने बड़े घर की दीवारें खड़ी की थी , वो तो अब इन दीवारों का मेहमान रहा ही नहीं.. .. चित्रा (उनकी पत्नी) शब्द,सुर, संगीत और हिम्मत हार गयी है .. कदम मंच की और जाने से इनकारी हो गये हैं .. ..तबले की थाप के साथ साथ जैसे आंसू भी संगीत की संगत करने लग पड़े हैं, पीछे सिर्फ दर्द रह गया है ..और उस दर्द को ये भी नहीं पता के जाए तो जाए कहाँ ?
गजल तब भी गाई जाती थी| एक से बढकर एक फनकार होते थे. लेकिन वो गजल सुनने वालों को भारी लगती थी ,, जगजीत आया तो उसने आम आदमी की भाषा जैसी गजलों को चुना | अपनी चीस भरी आवाज़ में उनको गया | वो हर उस किसी के पास जाना चाहता था जो गजल का दीवानगी की हद तक दीवाना था.. और जब वो उनके पास गया तो दीवानों ने उनके कदम चूम लिए और कहा ..वाह !
वो शख्श जिसके बारे में मैं अब तक बोलता चला आया हूँ , एक दिन बिलकुल सफैद कुरते पाजामें में मेरे सामने बैठा था ..  जगजीत सिंह | पंजाबी लहजा, माखन जैसी मुलायम आवाज़, हम उनके दीवानखाने में, एक दुसरे के भीतर उतरने की कोशिश कर रहे थे.. और हमारे आस पास फैली थी अनहद शांति .. ..

-  इस बेहिसाब सफलता का क्या कारण मानते हो ?
जगजीत-  सफलता की पहली शर्त ये होती है कि जो काम आपने शुरू किया है, वो आपको आता भी है या नहीं ? उसके बाद शुरू होती है सख्त मेहनत, अगर आप अपनी मेहनत के लिए पूरी तरह से इमानदार हो फिर तो सफलता न मिलने का सवाल ही पैदा नहीं होता, हाँ सफलता की डिग्री अलग हो सकती है[ मैं पहले संगीतकार हूँ, फिर मैंने गजल को चुन लिया[ मैं कॉलेज के दिनों से ही स्टेज प्रोग्राम करता आया हूँ | इन सब में सफलता पाने के लिए मुझे उर्दू भी सीखना पड़ा | मैंने सारे तीर भत्थे में भरकर तयारी शुरू की , फिर तो मेरी मेहनत और किस्मत ने ही मेरा साथ निभाना था | मैं बहुत ही साधारण किस्म का बन्दा हूँ, न हंकार, न चालाकी, न ही फालतू का दिखावा |

- लेकिन जब आप सीख रहे थे , उस वक्त कभी सोचा था  कि इतनी सफलता भी मिलेगी ?
जगजीत- उस समय तो ये भी नहीं सोचा था कि संगीत को ही जिंदगी बना लूँगा; हाँ कभी कभी प्लेबैक सिंगर या संगीतकार बनने का सपना जरूर देखा करता था | हमारे वक्त में माता पिता ही तय करते थे के बच्चे ने क्या बनना है | वो मुझे आई ये एस करवाके बड़ा ऑफिसर बनाना चाहते थे |  मैंने आर्ट्स के साथ ग्रेजुएशन और हिस्ट्री के साथ एम् ए की लेकिन फिर मैंने फैसला कर लिया कि संगीत के मैदान में ही सब कुछ करना है और मैं 1965 में मुंबई आ गया | (8 फरबरी 1941 को जन्में जगजीत बचपन की गलिओं को कुरेदने लग गये, कैसे उन्होंने उस्ताद जमाल खान से संगीत सीखा, कैसे वो पहले पढने में होशयार होते थे बाद में कमजोर हो गये |

- आई ऐ एस बनने का विचार क्यों त्याग दिया ?
जगजीत- उस के लिए पढना पड़ता था, एक यही तो काम था जो करना नहीं आया |

- गजल को ही क्यों चुना ?
जगजीत- गजल की पोएट्री मुझे अच्छी लगती है |  इसमें मीटर है, शिश्त है | भजन या हिंदी कविता में कभी कभार ऐसा हो जाता है कि लाइन्स आउट ऑफ मीटर हो जाती हैं लेकिन गजल में ऐसा कभी नहीं होता |

- अच्छी गजल की तलाश कैसे करते हो ?
जगजीत- क़िताबें पढता हूँ | ग़ज़लकारों के संपर्क में रहता हूँ. देखता हूँ कि गजल कि भाषा मुश्किल नहीं होनी चाहिए | उसका विचार ऐसा हो कि कोई भी सुने और घर जाकर सोचने के लिए मजबूर हो जाए | हर किसी को ऐसा लगे कि इसमें तो मेरी जिंदगी का भी कोई हिस्सा है | मैं पहले रचना देखता हूँ और लिखने वाले का नाम बाद में |

- रिआज़ कितने घंटे करते हो ?
जगजीत- घडी देखकर कभी रिआज़ नहीं होता, बैठ गये तो फिर बैठ गये.. ..!

- गाने वाले फनकारों में कौन अंदर तक छूह लेता है ?
जगजीत- मेहंदी हसन, आमिर खां, तलत महमूद, लता बाई के पुराने गाने अच्छे लगते हैं | आज कल रशीद खां भी बहुत अच्छा गाने लग गए हैं | कोई एक प्यारा नहीं है | नए लोगों से उतना अच्छा नहीं आ रहा | सभी शोर्ट कट ढूँढ़ते हैं | वो सीखने से भागते हैं, मैं सीखने को भागता हूँ .....इतना ही अंतर है हम और उन में.....?

- घूमने के लिए कौन सी जगह अच्छी लगती है ?
जगजीत- यूरोप के शहरों में घूमना अच्छा लगता है | वहां आपको पुरानी संस्कृति , और इतिहास देखने को मिलता है | रोम, पेरू, इथोपिया बहुत कुछ संभाल कर बैठे हैं | बाकी गंगानगर की गलीआं और डी ए वी कॉलेज जन अच्छा लगता है |

- आपके सुनने वाले कैसे लोग हैं ?
जगजीत- पूछो न , गाने के लिए मूंह खुला नहीं कि साथ ही शुरू हो जाते हैं | मेरी गजलें मुझ से ज्यादा उनको याद हैं.. वो पूरे का पूरा गाना मेरे साथ गाते हैं, और सच कहूं तो यही लोग मेरी प्राप्ति हैं..वो स्टेज से उतरने ही नहीं देते |

- आपके ऊपर हमेशा ये दोष लता रहा है कि आप अपने शो हमेशा पांच तारा होटलों में ही करते है यहाँ आम आदमी जा नहीं पाता ?
जगजीत- मैंने कभी भी पर्बन्ध्कों को नहीं कहा कि ऐसा करो , वो तो जाकर ही पता चलता है कि मैं कहाँ गा हूँ..  ये मरी समस्या नहीं है.. मैं तो घरों कि महफिलों में भी गा लेता हूँ |

- आपका रोजनामचा कैसा है ?
जगजीत- जिंदगी.. संगीत के रास्ते में मिली सफलता और दर्द के काँटों कि चुभन के पुल के ऊपर से गुज़र रही है बस | अगर कहीं से फुर्सत मिलती है तो मैं स्पोर्ट्स चैनल देखता हूँ | टेनिस, रबी, हॉकी,फूटबल, बालीवाल | कॉमेडी चैनल और फ़िल्में देखकर फेफड़ों कि कसरत करता हूँ | अगर ज्यादा वक़्त मिलता है तो गाड़ी में कुल्फी या आइस क्रीम रखता हूँ और खंडाला चला जाता हूँ और वहां की बगीची कर अपनी उस दिन की मोहर लगता हूँ |

- आखिर संगीत ने आपको किया दिया है ?
जगजीत- बहुत कुछ.. .. पैसा, नाम, यार दोस्त, सकून, बाकी चीज़ों का मैं संगीत के साथ कोई बड़ा सम्बन्ध नहीं समझता | जिंदगी एक गोरखधंदा है जिसको हर किसी ने भुगतना ही है | इस पेशे में आप अपने मालिक आप होते हो | आपको 9 से 5 की ड्यूटी नहीं करनी पड़ती | हम लोग जितने भी कलाकार होते हैं मूड में जीते हैं मजबूरी में नहीं |

- क्या यही कारण है कि आपने फिल्मों में कम गाया है ?
जगजीत- ये सिर्फ एक वजह है, और भी कई कारण हैं | पहली बात तो यह है कि मेरी आवाज़ फिल्मों को जचती ही नहीं | सोबर आवाज़ में चीपनेस जचती ही नहीं है | मैं मोहम्मद रफ़ी कि तरह गाऊँ तो मेरी आवाज़ खराब हो जाती है | इसकी एक अपनी किस्म की रेंज है | दूसरा फिल्मों के लिए वक़्त भुत बर्बाद करना पड़ता है | वहां अंगुली करने वाले बहुत से होते हैं | अब संगीत विकता है | फिल्मों की पोजीशन बदल चुकी है | जैसा वहां है वैसा तो मैं गा ही नहीं सकता |

.. .. . और समय चलता चला गया .. ..मैं इंतज़ार कर रहा था कि कब बातें करते करते गजलों के कुछ अलफ़ाज़ तरेल तुप्कों कि तरह टपकने शुरू हो जाएँ .. .. दबे पांव छिड़ जाए कोई सुरों कि महफ़िल.... लेकिन मेरे हाथ कुछ भी नहीं लगा .. ..संगीत तो शायद रीआज़ की गलिओं में बंद था .. ..मैं और कहानिया सुनना चाहता था लेकिन समय की मनमानी को कौन आँखें दिखा सकता है .. .बाहर खड़ी गाडी ने आवाज़ लगा दी और जगजीत किसी शो के लिए रवाना हो गये .. .. बातें मेरा नसीब थी और शायरी किसी और का .. .. और मैं फिर कॉफ़ी की तरफ हो लिया, सोचता हुआ,.. .. तू नसीब है किसी और का , तुझे चाहता कोई और है.. ..!!!!!
 

Friday, 22 June 2012

सागर सरहद्दी से मुलाक़ात

मैं अच्छी किताबें खरीदकर ऐश करता हूँ- सागर सरहद्दी

मुंबई में जिन लोगों के साथ मेरी चाय सांझी है उनमें एक नाम सागर सरहद्दी साहब का भी शामिल है, मेरे मस्त मौका दिनों की पनाहगाह | रंगमंच के कीड़े को शांत करने का चश्मा | मैं कभी कभार उनके साथ ऐसी बातें भी करता रहता था जिनकी मेरे अंदर भूख थी कि मैं उनके अंदर से निकल सकूं , कोई पता नही बिन बुलाए मेहमान की तरह उन्हें कौन सा सांप कब डंग जाए और वो किधर को भाग जाएँ ?
बहुत सारे लोग जानते हैं, और नहीं भी जानते कि सागर साहिब की चर्चा हमेशा नुक्कड़ नाटक और या फिर 'कभी कभी', 'सिलसिला', 'नूरी', 'चांदनी', 'बाज़ार'  जैसी फिल्मों के सफल लेखक के तौर पर कहीं न कहीं होती ही रहती है | लेखक-निर्देशक के नाते 'बाज़ार' उनकी पहली फिल्म थी | ये फिल्म बॉक्स ऑफिस पर तो भले ही उतनी न चली हो लेकिन इसने बड़े बड़े दिग्गजों को सोचने पर जरूर मजबूर कर दिया था |
'दूसरा आदमी', 'अनुभव', 'सवेरा', 'कर्मयोगी', 'दीवाना', 'कहो न प्यार है'  जैसी फिल्मों के सफल लेखक सागर सरहद्दी ने 'अगला मौसम', 'तेरे शहर में', 'वगदे पाणी' (पंजाबी) जैसी फिल्में भी निर्देशित की, लेकिन उनके रिलीज़ न हो पाने का उनको अभी तक दुःख है |
'तन्हाई', (नाटक) 'ख्याल दस्तक',(छे नाटक), 'आवाज़ों का मिउजिअम', (मिनी कहानी), 'जीव-जानवर' (कहानी), 'भगत सिंह की वापसी' और 'मसीहा' (पंजाबी नाटक) जैसी किताबों के लेखक सागर साहिब जब भी कोई नई फिल्म लिखते हैं तो उस फिल्म की अपनी अलग पहचान बन जाती है |
मरीन ड्राईव के सब से आखरी पत्थर , नहीं सच उस से पहले वाले पत्थर पर उनको एक दिन मैंने ज़बरदस्ती बिठा लिया गर्म कौफी का मग उनके हाथ में पकड़ाकर | अब कौफी को सिप सिप पीते वो अपनी बातों को दाने की तरह खिलारते चले गये और मैं चुगता चला गिया --
? - आपके लिए जिंदगी की सब से बड़ी ख़ुशी क्या है |
० - मैं आम आदमी के लिए काम करता हुआ मानसिक ख़ुशी महसूस करता हूँ |

? - अपनी जिंदगी में आप किस इन्सान या घटना से प्रभावित हुए हो ?
० - इन्सान के तौर पर मुझे मेघा पाटकर के कामों और घटना के तौर पर मुझे देश के बटवारे ने बहुत प्रभावित किया है |

? - आप ने कभी सोचा कि आपका जन्म किन कामों के लिए हुआ है ?
० - हाँ , अच्छे नाटक लिखने, मंचित करने और फ़िल्में बनाने के लिए |

? - आपकी जिंदगी में कभी कोई मर्द या औरत, आपसे कभी प्रभावित  हुआ है या नही ?
० - मैं यकीन के साथ किसी का नाम नहीं ले सकता, वैसे तो बहुत सारे लोग अक्सर ही बोल देते हैं कि मैं आपसे बचपन से प्रभावित हूँ |

? - आप किस बात से सबसे ज्यादा डरते हो ?
० - कि कहीं जिंदगी में ज्यादा सुस्त और आलसी न हो जाऊं |

? - वो कौन सा लेखक है जिस से आप बहुत ज्यादा प्रभावित हुए हों और क्यों ?
० - दोस्तोवस्की, क्योंकि उनकी रचनाओं में क्राइम और म्नोविगियन का तालमेल कमाल का होता था |

? -वो कौन सा सपना है जिसको पूरा करने के लिए आप अभी तक लड़ रहे हो?
० - आम आदमी की ख़ुशी के लिए मैं आखरी दम तक लड़ता रहूँगा |

? - आपको कोई भी बड़ा झूठ बोलने की जरूरत कब पडती है ?
० - जब सामने वाले को कोई तकलीफ न हो और मैं कोई समझौता करने से बच जाऊं |

? - वो कौन सा शर्मनाक  हादसा था जिस ने आपको बुरी तरह तिनका तिनका कर दिया हो ?
० -  बहुत लम्बी खज्ल्खुआरि के बाद कोर्ट में बुरी तरह हार जाना और अपनी फिलम 'तेरे शहर में' रिलीज़ न कर पाना |

? - अपने अंतर मन से आप क्या पसंद करते हो और क्या न-पसंद ?
० - शराब, औरत, और कुदरत को बहुत पसंद करता हूँ | रुकना और किसी भी तरह की पाबंदी मैं अपने उपर लागू नहीं होने देता |

? -  जिंदगी का कोई बहुत ही कडवा सच जिसको आप अभी तक भुला नहीं पाए ?
० - 'लोरी' फिल्म का फ्लाप हो जाना और 'अगला मौसम', और 'तेरे शहर में' (जो स्मिता पाटिल की आखरी फिल्म थी) का रिलीज़ न हो पाना |

? - आज तक पढ़े नाटकों में आपको सब से अच्छा कौन सा नाटक लगा ?
० - 'अँधा युग', क्यों कि इसमें आम आदमी की बेवसी और इस से पैदा होने वाले दर्द को बहुत ही शिद्दत से पेश किया गया है |

? - कैसे वस्त्र पहन कर आप अपने आपको रोमांटिक महसूस करते हो ?
० - सफेद कपड़े पहन कर तो मुझे ऐसा महसूस होता है कि मैं किसी अप्सरा के साथ आसमान में उड़ता चला जा रहा हूँ |

? - अपनी मेहनत के पैसे ऊपर आप किस किस्म की ऐश करते हो ?
० - मैं कुदरत को बहुत ही नजदीक से निहारता, ओढ़ता, पीता हूँ और ढेर सी किताबें खरीदता हूँ |

? - आपसे अगर कलम और मंच छीन लिया जाये तो आप क्या करोगे ?
० - तो शाएद दुनिया के सब से खूंखार, कातिल का नाम सागर सरहद्दी होगा |

? - आप अपनी ग्लतिओं को किस तरह नजर अंदाज़ करते हो ?
० - नजर अंदाज़ क्यों करूं भाई, वो तो मुझे बहुत कुछ सिखाती हैं और मुझे आगे की और धकेलती हैं |

? - भारती इतिहास में आपको सब से जयादा कौन सा किरदार मसंद है ?
० - भगत सिंह |

? - किसी भी जबरदस्ती के खिलाफ आपके विरोध की सुर कैसी होती है ?
० - मैं अपनी तर्कपूर्ण आवाज़ बुलंद करता हूँ और मेरी ये भी कोशिश होती है के ऐसी जबरदस्ती दोबारा न हो |

? - नाटक या फिल्म के क्षेत्र में आप अपना दखल कौन सी सीमा तक महसूस करते हो ?
० - कभी ज्यादा, कभी कम, यह तो बिजी होने के तरीके पर निर्भर करता है |

? - बॉलीवुड की सब से बढ़िया फिल्म ?
० - मदर इंडिया

? - आप हर समय सुर्खिओं में रहना क्यों पसंद नहीं करते ?
० - ऐसा करके मुझे लगता है के मैं वल्गर हो जाऊंगा |
? - आपने कौन सा ऐसा ख़ास काम किया  था जिस से कुछ ख़ास लोगों को जलन होने लगी थी ?
० - 'बाज़ार' के रिलीज़ होते ही बालीवुड के कुछ 'ख़ास' ने बहुत ही ख़ास मीटिंगें आयोजित की थी |

? - आप कैसी लडकी को पसंद कर सकते हो ?
० - ये तो मेरे मन की बूझ ली आपने | लडकी ऐसी हो जो मेरी सारी ग्लतिओं को माफ़ कर दे |

? - आप अपने संघर्ष को किस तरह परिभाषित करोगे ?
० - ढेर सारा क्रन्तिकारी साहित्य पढना, लिखना और विव्श्था से लड़ना |

? - आप अपने सम्बन्धों को किस तरह आईने में पेश करोगे ?
० - देखे, सुने, और निभाए बगैर आईने से पर्दा नहीं उठाया जा सकता |

? - आप कौन सा काम पूरा न होने तक जिंदा रहना चाहोगे ?
० - हजारों ख्वाहिशें ऐसी कि हर इक ख्वाहिश पे दम निकले |
                                                                                      बस अभी इतना ही .. .. !!

Friday, 1 June 2012

गुलज़ार उर्फ़ सफेद समंदर

गुलज़ार की फिल्म देखी थी 'मौसम', लेकिन अब ऐसे लगता है कि उसका नाम सफेद मौसम होना चाहिए था | गुलज़ार  के स्वभाव जैसा, लेकिन एक दिन वो भी आ गया कि जिस  गुलज़ार को मिलने के लिए मैं पिछले कितने ही सालों से कोशिशें कर रहा था उसी गुलज़ार से से मेरा सामना उनकी फिल्म 'माचिस' के सेट पर हुआ | उनके साथ बहस करने के ख्याल का मुझे गला घोंटना पड़ गया | स्टूडियो था  फिल्म्स्तान और एरिया था मुंबई का गोरेगांव |  मैं सिनेमाटोग्राफर मनमोहन सिंह के साथ सहायक के तौर पर काम करता था और गुलज़ार साहब  उस जहाज के कप्तान थे | ये मेरी शुरुआत थी इस लिए मैं सीखता कम और फिल्म को बनते हुए ज्यादा देखता था | सुबह की नमस्कार के बाद सारा दिन उनके साथ किसी भी किस्म की कोई बात नहीं होती थी | वो अपना काम करते थे और मैं सारा दिन मूक दर्शक बना उनको देखता रहता था | 'माचिस' बन गयी, रिलीज़ हो गयी और मैं फिर से गुलज़ार साहब को मिलने के लिए तड़पने लगा |
फिर खबर आई कि गुलज़ार साहब दो और फ़िल्में बनानें जा रहे हैं, 'मजहब' और 'हु-तू-तू' | एक बार फिर मेरे चेहरे पर ख़ुशी का रंग उमड़ आया 'मजहब' तो खैर अभी तक नहीं बनी हाँ 'हु-तू-तू' की पूरी शूटिंग मैंने उनके साथ की | इस बार उनके साथ थोड़ी थोड़ी गुफ्तगू होनी भी शुरू हो गयी थी | और मैं था कि मौका पाते ही उस सफेद समन्दर से कुछ न कुछ निकालने लग जाता था |  मुझे अमृत नहीं चाहिए था लेकिन जो चाहिए था वो अमृत जैसा ही कुछ था |

हर समय सफेद वस्त्रों में लिपटा हुआ ये शख्स देश के बटवारे का इतना काला अँधेरा अपने भीतर समेट कर बैठा है जिसको अगर हम हिलाना शुरू कर दें तो सिसकीओं की आवाज़ों के इलावा कुछ भी सुनाई नहीं देगा हाँ कुछ दफ़न हुई आहें आप तक पहुँच जाएंगी |
गुलज़ार अपने बाप के दुसरे विवाह की इकलौती औलाद है | अभी वो एक साल का भी नहीं हुआ था कि कुदरत ने 'माँ' शब्द उसके होठों से छीन लिया था, इस लिए वो किसी को भी बता नहीं सकता कि माँ के नक्श कैसे होते हैं ?
ये सफेद समंदर १९४९(1949) में मुंबई आया था लेकिन उसने अपनी पहली फिल्म निर्देशित की थी १९६०(1960) के  आखिर में, नाम था 'मेरे अपने' |
गुलज़ार साहब से मेरी मुलाकातें बढ़ी तो जरूर लेकिन आहिस्ता आहिस्ता | वो शख्स भीतर से इतना भरा हुआ है कि उसको आधा अधूरा सोचा भी नहीं जा सकता | शाएरी और सिनेमा उस के लिए दो आँखों की तरह हो गये हैं जिनके बगैर वो जैसे चल फिर ही नहीं सकता |
गुलज़ार की एक मुश्किल हु-ब-हु मेरे साथ भी मिलती है कि निर्माता लोग जो कुछ उनसे बनवाना चाहते हैं उस के लिए सौ वार सोच कर हाँ कहनी पडती है और जो कुछ उनके पास है उसके लिए निर्माता नही मिलते | बिलकुल  ऐसी स्थिति में से मुझे भी अभी तक गुजरना पड़ रहा है मसलन अगर उन्होंने कृष्ण चन्द्र और मंटो सम्भाल कर रखे हुए हैं तो मैंने भी अमृता प्रीतम , दलीप कौर टिवाणा, गुरचरन चाहल भीखी, जसबीर भुल्लर, प्रेम प्रकाश और गुरपाल लिट्ट की कहानियां सम्भाल के रखी हुई हैं |
एक लगातार्ता का नाम है गुलज़ार | मैं गुलज़ार के लिए बोलना चाहता था | उनके साथ हुई मुलाकातों से जैसे वो तो सारे का सारा मेरे भीतर भी भर गया था, लेकिन न जाने क्यों मेरा अंदर मंच की तलाश के लिए मुनकर हो गया था | मैंने अपने ही शब्दों का मंच त्यार कर लिया और उस मंच से शब्दों की एक तस्वीर बन गयी | कैसी बनी है ये तो आप बताएँगे न ?


कौन है गुलज़ार
मैं नहीं जानता..
शायद कोई भी नहीं जानता ,
जिसने भी जाना है गुलज़ार को
शायद उसके चलचित्रों की मार्फत जाना है
उसकी शायरी सुनी है
अलग अलग आवाज़ों के दर्द में ..
उसके संवाद को सुना है
अदाकारों की अदायगी से
इतना सब कुछ देखते सुनते
और पर्दे के मंच ऊपर घुमते हुए भी
किसी ने नहीं जाना
कि कौन है .. .. गुलज़ार ?

शायद कोई भी नहीं जानता
कि बटवारे की लाल जमीन पर सिसकती
नज्मों का नसीब
पानी के ऊपर खीची गयी लकीर
सपनों की चाल चलती हवा
अपने ही दूध से
अपने ही किनारों को जला देने का नाम
हो सकता है .. .. गुलज़ार ..!

 शायद कोई भी नहीं जनता
पिघल कर कागजों पर फैली आग
खेतों में बोए अधनंगे चिहरे वाले बीज
पतझड़ में खुंदक कर लौटी आवाज़
ऊँची पहाड़ी पर हंसती हरिआवल
ठंडी हवा में सुनाई देने वाली
सीटी का नाम हो सकता है
               गुलज़ार .. ..

हो सकता है
कि कोई जनता भी हो
कि जब कभी अँधेरी रात में
लटकते हैं सुपने
चुन्नी के सितारों की तरह
जा बैठते हैं वो
समंदर की ठंडी छाती पर
और हो जाती है वो रात
किसी बच्चे के बचपन जैसी
और शोर मचाता है समंदर का पानी
किसी को मिलने के लिए
तो हो सकता है
कोई जानता भी हो
समंदर के घुस्मुसे में मिलने वाला
गुलज़ार ही हो सकता है.. ..

हो सकता है
कि कोई जानता भी हो
कि जिसकी आँखों में
उदासी तैरती है
आवाज़ में मुस्कान खेलती है
जिह्न कि ममटी उपर
इबारत बैठती है लिबास कि तरह
अपने उपर ओढ़ता है वो चांदनी
उस मिटटी के पेड़ को
लगे फल का नाम
सिर्फ और सिर्फ
गुलज़ार ही हो सकता है

हाँ
ये सब जानने वाला
और कोई नहीं मैं हूँ
सिर्फ और सिर्फ मैं.. ..
क्यों कि-
किसी को ये हक नहीं है
कि जो मैं जानूं
उसे कोई और भी जाने
क्यों कि मैं जनता हूँ
वो.. .. जो मेरा गुलज़ार है
हजारों नदिओं का विष पिया है जिसने
जिसके खून की गंध बन गयी है
सरस्वती . ..

शब्दों की रखवाली के लिए
पैदा हुआ है जो
आंसुओं की नमी वाला
कागज़ है वो
सपनों के पानी पर तैर कर
आसमान पर छिडकता है रंग
अपने आप से करता है
घने कोहरे जैसे संवाद
अपने जिस्म की आग से सेकता है
बीत गये सालों में
ठिठुरता हुआ इतिहास

आंसू संभालता है
ज़ख्मों को सीता है
हवा को भिगोता है
रातों को जागता है
ख्वाबों से लिपटता है
बातों को बुनता है
चुम्बन को जलाता है
दीयों को सुलता है
मेरा गुलज़ार है वो
सिर्फ मेरा गुलज़ार
ऐसा गुलज़ार मैं किसी का होने भी नहीं दूंगा

ऐसा गुलज़ार
मैं किसी को सोचने भी नहीं दूंगा

इतना मिल चुका हूँ मैं उनसे
कि शायद जरा सा भी नहीं मिला

दिल करता है
हर पल उनके साथ रहूँ
डर लगता है
फिर शायद वो मेरे पास नहीं रहेगा
या हो सकता है
वो सब से ज्यादा मेरे पास ही रहे

मेरे भी तो सपने हैं
उड़ सकता हूँ मैं भी
एक ही सपना है मेरा - गुलज़ार
एक ही उड़ान है मेरी - गुलज़ार
जिंदगी की डायरी का हर पन्ना
हो गया है शायद गुलज़ार के नाम
जिस उपर लिखता हूँ मैं सिर्फ
कुछ सुलगते सवाल ..
मौसम की वफादारी .. ..
मन का गुलाब .. ..
आँखों की जुबान .. ..
अम्बर के सितारे .. ..
चेहरे का इंतजार .. ..
और सिर्फ और सिर्फ
गुलज़ार .. .. गुलज़ार .. .. गुलज़ार .. ..

गुलज़ार तुम जिंदा रहो
आने वाले कल के लिए
जाती हुई लहर के लिए
सुलगते आसमान के लिए
जागते सपनो
और हंसती रौशनी के लिए
हवा के हाथों में अपना चेहरा दे दो
और
गुलज़ार तुम जिंदा रहो
क्यों कि तुमने जिंदा रहना है
और सिर्फ जिंदा रहना है .. .. !!!!!